रविवार, 4 जुलाई 2021

हम और हमारा देश

भारत एक ऐसा देश है जो विभिन्न धर्मो, जातियों, जलवायु और भाषाओं का अजायबघर कहा जा सकता है। यही कारण है की प्राचीन काल से ही भारत की ओर विश्व के अनेक योद्धाओं और देशों ने ललचाई दृष्टि से देखा।भारत देश का यह आकर्षण ही कहा जायेगा कि मुगल साम्राज्य के शासकों ने तो भारत को अपना ही देश मान लिया और यही रच बस गएऔर यहां तक के इस धरती में ही समा गए। मुग़ल बादशाह हों ने इस देश को वैभवशाली इमारतें और व्यवस्थाएं प्रदान कीं। इसके बाद ब्रिटिश व्यापारिक ईस्ट कंपनी ने भारत की ओर कूच किया । धीरे धीरे यहां अपना व्यापार बढ़ाया और उसके माध्यम से धीरे-धीरे यहां की शासन व्यवस्था भी हतिया ली किन्तु मुग़ल शासकों की भांति यहाँ रच बस न सके और न ही इस देश से भावनात्मक रूप से जुड़ सके। बल्कि यहां से बहुत कुछ ले गए ।देने को मात्र कुछ प्रशासनिक व्यवस्थाएं ,अंग्रेजी भाषा और  इसके साथ ही  हमारे एक देश के दो टुकड़े भी कर गए, जिसको आज भी हमारा देश भोग रहा है। इतना ही नहीं उन्होंने कुछ ऐसा षड्यंत्र रचा जिसके दूरगामी परिणाम आज भी  हमारे देश को भुगतने पड़ रहे हैं। हमारा एक राष्ट्र अनेक जातियों, उप जातियों, भाषाओं और धर्मों में  उलझ गया । देश मे अलगाव  और नफरत की  राजनीति को बल मिलने लगा। यह सब स्थिति उत्पन्न करने में ब्रिटिश शासकों का अहम किरदार रहा है ।  यह अलग बात है कि  इसके पीछे हमारी देशी रियासतों और  रजवाड़ों के निजी स्वार्थ  भी सिद्ध हुए। लेकिन स्वतंत्र भारत में हमारे देश के कर्णधारो  और सरकार ने  देश को एक आधुनिक ,सक्षम ,पंथनिरपेक्ष गणराज्य बनाकर विश्व में एक सुंदर उदाहरण प्रस्तुत किया ।यही कारण है कि आज भी विश्व भर में भारत को एक अलग और सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। उसके पीछे जहां यहां के संसाधन ,जनसंख्या और प्रतिभाओं का योगदान  रहा है वहीं  यहां की मिली-जुली संस्कृति और सहभागिता ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। लेकिन जैसे जैसे समय बीतता गया और देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था का स्वरूप बदलता गया यहां की राजनीति भी दूषित होती गई । जहां स्वतंत्रता  पश्चात की राजनीति पूर्णता देश को समर्पित और व्यापक सोच के साथ आगे बढ़ी थी, वही धीरे-धीरे  भारतीय राजनीति में जातिवाद, क्षेत्रवाद और संप्रदायवाद  का घिनौना चेहरा उभरना शुरू हो गया जो भारत ही नहीं किसी भी विकासशील  देश के लिए एक अभिशाप से कम नहीं है। अब जब स्वतंत्रता क्रांति हो चुकी है और भारत एक नए युग में प्रवेश कर रहा है ।ऐसी  स्थिति में हमारे देश के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य बन जाता है कि हमें गंभीरता से और सहनशीलता से देश को एक सूत्र में बांधे रखना है भले ही उसके लिए हमें छोटे-मोटे त्याग क्यों ना करने पड़े क्योंकि यही त्याग और आपसी भाईचारा देश की जड़ों को मज़बूती  देगा। हमें अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था को और ईमानदारी से मजबूत करना होगा। इसके साथ ही लोकतंत्र के चौथे स्तंभ अर्थात पत्रकारिता को निष्पक्षता के साथ  मजबूत करने की आवश्यकता है।
डॉ  ज़ुल्फ़िकार गुन्नौरी

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