बुधवार, 18 अगस्त 2021

पेट्रोल के बढ़ते दाम ज़िम्मेदार कौन?

*लगातार बढ़ते पेट्रोलियम पदार्थों के दाम, ज़िम्मेदार कौन!* 
यूं तो पेट्रोलियम पदार्थों के रेट थोड़े बहुत आमतौर पर घटते/ बढ़ते  रहते  हैं , लेकिन पिछले कुछ सालों से इन पदार्थों के दामों में हो रही बेकाबू तेजी यह दर्शाती है कि कहीं न कहीं कुछ ठीक नहीं चल रहा । यह चाहे पेट्रोलियम पदार्थों की कंपनियों के द्वारा हो या सरकार द्वारा,  कहीं तो जनता की अनदेखी की जा रही है। एक तो भारतीय जनता की कोरोना महामारी  आर्थिक स्थिति वैसे ही दयनीय चल रही  है । उसके साथ ही कुछ सरकारी नीतियों से भी जनता पर अनावश्यक बोझ पड़ा है  उसके बाद पेट्रोलियम पदार्थों का बढ़ना किसी भी स्थिति में सही नहीं है। सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि इस विषय पर गंभीरता दिखाते हुए बढ़ती हुई महंगाई पर रोक लगाए विशेष कर डीज़ल पेट्रोल और रसोई गैस पर। हम भी उसी  विश्व का हिस्सा हैं जहां अन्य देश अपनी अर्थव्यवस्था को संभाले हुए हैं, पूरे विश्व मे भारत ही अकेला ऐसा देश है जहाँ पेट्रोलियम पदार्थों पर इतना भारी भरकम टेक्स लगाया जा रहा है ,जो लगभग 150 प्रतिशत से भी अधिक हो चुका है। जबकि हमारे देश में खनिज पदार्थ और कृषि उत्पादन अन्य  देशों से  बेहतर है। इसके अलावा हमारे उद्योग धंधे भी कम विकसित नहीं है। इतने होने पर भी बड़े-बड़े टैक्स लगाना और पेट्रोलियम पदार्थों के दामों को काबू में  ना करना यह सरकार की एक बड़ी नाकामी कहा जा सकता है। जिसको गंभीरता से लेने की आवश्यकता है । जनता लगातार सरकार को समर्थन करती आ रही थी।  आंदोलन और आलोचना से भी बच रही थी  लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि जनता की आर्थिक स्थिति और उसके भावनाओं की अनदेखी की जाए। सरकार की पहली प्राथमिकता जनता की सुख सुविधाओं और सुरक्षा की गारंटी होनी चाहिए न कि बयानबाज़ी और तर्कों से अपना बचाव करना।                                                              *डॉ ज़ुल्फ़िकार*                                                           ( शिक्षक)  ,                      ए एम यू,अलीगढ़।

शुक्रवार, 13 अगस्त 2021

देश और नागरिक

                     हम और हमारा देश                                                     किसी भी देश के लिए  उसके नागरिकों का शिक्षित, जागरूक और व्यापक सोच का होना आवश्यक है ।यदि उस देश के नागरिक शिक्षित ,व्यापक सोच  और सकारात्मक मानसिकता के होंगे तो वो देश दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर सकता है। जहां तक भारत का प्रश्न है , यह देश  विभिन्न, जातियों, धर्मो, जलवायु और संस्कृतियों वाला राष्ट्र है । यहां समय-समय पर अलग-अलग तरह की शासन व्यवस्था रही है। देशवासियों ने शोषण करने वाली ब्रिटिश शासन भी देखा है और उससे पूर्व मुगलों का साम्राज्य भी। दोनों शासन व्यवस्था  विदेशी ही थी लेकिन दोनों में मूलभूत अंतर देखने को मिला ।जहां (मुग़ल) अपनी संस्कृति और सभ्यता के साथ साथ यहां शासन कर रहे थे और हमारे देश को सुरक्षा के साथ-साथ स्थापत्य कला और खानपान की एक विशाल श्रृंखला प्रदान कर रहे थे  जिसे हम आज भी बड़े गर्व से भारत की एक उपलब्धि मानते हैं।  वहीं इसके विपरीत अंग्रेजी शासन व्यवस्था ने  प्रशासनिक सुधार किए और रेलवे लाइनों का  यहाँ जाल बिछाना शुरू किया । उनकी राजनीतिक सोच भारतीयों के विपरीत थी । वो "बांटो और राज करो " की नीति पर चलते थे और देश के निम्न वर्ग को और निम्न बनाने पर बल देते थे। भारतीयों की प्रतिभाओं का इतना आदर नहीं था जितना होना चाहिए था।इसीलिए  अट्ठारह सौ सत्तावन से एक जन आंदोलन चला। जिसको हम प्रथम  स्वतंत्रता आंदोलन के नाम से जानते हैं । यह आंदोलन विभिन्न रूप बदलता हुआ और कुर्बानियां देने के बाद 15 अगस्त ,1947  की मध्य रात्रि को स्वतंत्र भारत के रूप में स्थापित हुआ ।                                            इसके पश्चात  शुरू होता है भारतीय लोकतंत्र का एक नया अध्याय । हमारी शासन व्यवस्था हमारा संविधान हमारे देशवासियों के पास आया और हमने ऐसी व्यवस्था कायम की जिसमें सभी धर्मों सभी जातियों का विशेष ध्यान रखा गया और हम मिलजुल कर एक विशाल सशक्त भारत बनाने की परिकल्पना लेकर आगे बढ़े ।यह अलग बात है  कि धीरे-धीरे हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था शिथिल होती गई लेकिन फिर भी हमने अपने मूल्यों को बनाए रखा ।जो आज भी जारी है ।हमारे देश की एक विशेषता है  संविधान के अनुसार देश को चलाना। इसके साथ ही समन्वय की भावना भी हमारे राष्ट्र की एक पहचान रही है।जिसे  हम आज भी कायम किए हुए हैं ।इसके साथ ही भारतीय लोकतंत्र विश्व में सबसे बड़ा लोकतंत्र कहने का अधिकारी है ।हमारा देश एक गणराज्य है ,विभिन्न राज्यों का एक अजायबघर है,  बोलियों,भाषाओं, जातियों और विविध संस्कृतियों को एक राष्ट्र के रूप में समाहित किए हुए और सभी को पूर्ण मान्यता देते हुए इक्कीसवीं सदी का भारत नई इबारत लिख रहा है।जिसमे सभी जातियों, समुदायों ,रीतियो और नीतियों का साथ मिला हुआ है। अलग अलग राज्यो की अलग अलग संस्कृति और रीतियों के बीच एक ही राष्ट्र तिरंगे झंडे को सलामी देते हुए हर वर्ष 26 जनवरी और 15 अगस्त को एक नए उत्साह और यौवन के साथ नज़र आता है।।     

                   लेखक                                                              डॉ ज़ुल्फ़िकार गुन्नौरी                                              शिक्षक,चिंतक एवं समाजसेवी